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हमारी क्षमता नहीं, सोच सीमित होती है…

Writer: Nirmal Bhatnagar
Nirmal Bhatnagar
45 minutes ago
3 min read

Sep 23, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, कभी-कभी हमारे जीवन का सबसे बड़ा रोड़ा हमारे सामने नहीं, हमारे भीतर रहता है। जी हाँ, हम जीवन में कितनी ऊंचाइयों को छू सकते हैं, कितना सफल हो सकते हैं, क्या कर सकते हैं और क्या नहीं आदि सब हमारी वास्तविक क्षमता से तय नहीं होता, बल्कि इनकी सीमाएँ अक्सर उन धारणाओं से बनती हैं, जो हमने अपने बारे में बना रखी होती हैं।


अक्सर आपने लोगों को कहते सुना होगा कि “मैं यह नहीं कर सकता।”, “ये मेरे बस की बात नहीं है।”, “मैं इतना प्रतिभाशाली नहीं हूँ।”, “अगर असफल हो गया तो?” बार-बार कहे गए ये वाक्य, गुज़रते समय के साथ सामान्य विचारों से विश्वास में परिवर्तित हो जाते हैं और विश्वास हमारे व्यवहार को प्रभावित करने लगता है। इसी वजह से हम जीवन में अवसर आने से पहले ही पीछे हट जाते हैं और प्रयास करने से पहले ही परिणाम तय कर लेते हैं।


एक कोच और कंसल्टेंट के रूप में मैंने कई बार देखा है, अक्सर दो लोगों के पास लगभग समान अवसर और क्षमता होने के बावजूद उनके परिणाम अलग होते हैं। मेरी नजर में यह अंतर हमेशा प्रतिभा का नहीं, बल्कि नजरिये का होता है। कई बार एक व्यक्ति स्वयं को सीखने योग्य मानता है, जबकि दूसरा स्वयं को पहले ही सीमित कर चुका होता है।


इसे मैं हाल ही में घटी एक घटना के माध्यम से समझाने का प्रयास करता हूँ। एक प्रतिष्ठित विद्यालय में दो लोगों के समक्ष एक इवेंट को कराने का प्रस्ताव रखा गया। उन दोनों में से एक व्यक्ति ने अपनी व्यस्तताओं को बताते हुए उसे लेने से इनकार कर दिया। जबकि दूसरा, जो कम अनुभवी था, उसने सोचा, “मुझे अभी सब कुछ नहीं आता, लेकिन मैं सीख सकता हूँ।” सीखने की इस सोच ने दूसरे व्यक्ति को पहले वाले से थोड़ा बेहतर बना दिया। दोनों के पास सीखने का अवसर था, लेकिन एक अपनी आशंका या डर के कारण रुक जाता है, जबकि दूसरा लगातार सोचने की सोच या नजरिये के कारण आगे बढ़ जाता है। ऐसे ही सेल्फ बिलीफ या सेल्फ डाउट हमारे जीवन की दिशा तय करते हैं।


दोस्तों, अपनी क्षमता को पहचानने के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि हम आज क्या कर सकते हैं। कई बार हमारी वास्तविक क्षमता उन कामों में दिखाई देती है, जिन्हें हम सिर्फ़ इसलिए नहीं आजमाते क्योंकि हमें पहले से विश्वास होता है कि हम उनके योग्य नहीं हैं। इसलिए अपनी क्षमताओं को संदेह की नहीं, संभावनाओं की नजर से देखो। हो सकता है आज आप किसी काम में उतने सक्षम न हों, लेकिन सीखने, अभ्यास और निरंतर प्रयास करने के कारण बाद में वही काम आपकी पहचान बन जाए।


चार्ल्स डिकेंस का विचार, है; “इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति, जो दूसरों की परेशानियों को कम कर सकता है, फालतू नहीं होता।”, इसे एक नया और सुंदर आयाम देता है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारी क्षमता का मूल्य केवल इस बात से नहीं तय होता कि हम कितनी ऊँचाई तक पहुँचे। बल्कि आपने अपनी क्षमता का उपयोग किस उद्देश्य के लिए किया, यह भी हमारी क्षमता का मूल्य तय करता है। इसलिए स्वयं को सीमित करने से पहले एक बार रुकिए और पूछिए, “क्या मैं सचमुच यह नहीं कर सकता, या मेरा डर मुझे ऐसा विश्वास दिला रहा है?”


दोस्तों, अपने बारे में बनी पुरानी धारणाओं की समीक्षा कीजिए। हो सकता है, जिस रूप में आप स्वयं को 5 वर्ष पहले जानते थे, वैसे आप आज ना हो। आपकी समझ बढ़ी है, अनुभव बदला है और परिस्थितियाँ भी बदल चुकी हैं। याद रखिएगा, जीवन में कई दरवाज़े इसलिए बंद नहीं होते कि हम उनके योग्य नहीं हैं; कई बार हम उनके सामने खड़े होकर दरवाज़ा खोलने की कोशिश ही नहीं करते।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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